maharani aur tarzan

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sujitha1976
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maharani aur tarzan

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महारानी और टार्ज़न

अपडेट 1 - स्वर्णपुर राज्य
यह कई हज़ारों साल पहले की बात है. भारत तब एक विशाल संगठित राष्ट्र था और उसकी सीमायें बहुत दूर तक फैली हुईं थी.
उन दिनों भारत के ही उत्तर पूर्व भाग में समुद्री तट के कुछ ही दूर एक बेहद विशाल और समृद्ध राज्य था जिसका नाम था स्वर्णपुर.
यह राज्य अपनी उन्नति, खुशहाली और धन धIन्य के लिए प्रसिद्द था. स्वर्णपुर का नाम भी वास्तव में इस लिए ऐसा पड़ा था क्योंकि यहाँ पर लगभग सब घरों के बाहर सोने की की कारीगरी थी. यहाँ पर लोग काफी मेहनती और खुश हाल थे. यहाँ पर घरों के बाहर सोने के गुम्बद और पूरे राज्य में कई जगहों पर निर्माण के हेतु सजावट में सोने का उपयोग किया गया था.और तो और स्वर्णपुर का राजमहल दुनिया के किसी अजूबे से कम नहीं था. एक दम आलिशान, भव्य , और उसकी एक एक बनावट में अमीरी और धनाढ्यता साफ़ तौर पर दिखती थी.

स्वर्णपुर के राजा थे राजा विक्रम प्रताप सिंह. राजा विक्रम प्रताप एक ठीक ठाक राजा थे जिन्हे को यह राज्य अपने पिता से विरासत में मिला था. एक राजा के रूप में वह कोई बुरे नहीं थे लेकिन कोई बहुत अत्यधिक वीर या अतयंत कुशल भी नहीं. बस अपने पिता की विरासत को चल रहे थे. अपने ऐशो आराम और अपने भोग विलास को वह बहुत महत्व देते थे.

उनकी पत्नी और महारानी जो की एक चीनी मूल से थीं ,का निधन कुछ साल पूर्व हो चुका था.
पर राजमहल की असली शोभा थी - राजकुमारी अजंता

राजकुमारी अजंता अभी 18 साल की ही हुई थी
बहुत ही सुन्दर बहुत ही प्यारी और कई गुणों से संपन्न थी अजंता - वह राजा विक्रम प्रताप की इकलौती संतान थी और सिंहासन की वारिस भी.वह अच्छी शिक्षा ले रही थी और
18 साल की कम उम्र में भी राजकुमारी अजंता ने किताबों के अलावा तलवारबाजी, घुड़सवारी, युद्ध कला में प्रशिक्षण लिया था और वह अपनी कलाओं में वृद्धि कर रही थी. इसके अतिरिक्त वह कई यज्ञों द्वारा कुछ शक्तियां भी हासिल कर चुकी थी.
राजकुमारी अजंता 18 साल के उम्र में बहुत सुन्दर निकल आयी थी
चाँद सा मासूम चेहरा, भरा हुआ खिलता यौवन जिसको अलंकृत करते थे अजंता के उभरते हुए दोनो उरोज जो अभी भी कम से कम 34 इंच के हो चुके थे. उसका कद भी औसतन अपनी उम्र की लड़कियों के हिसाब से अधिक था और वह अभी भी ५ फुट 6 इंच से काम न थी. राजकुमारी अजंता का गदराया ,शरीर उसके खिले हुए गोरे रंग जिसमे मIनो किसी ने केसर मिला दिया हो से और अधिक सुन्दर हो जाता था और उसकी चोली और लहंगे के मध्य उसकी कमर भी अब बल खाने लग गयी थी.
राजकुमारी यों दिल की अच्छी और काफी प्रगतिशील विचारधारा की थी परन्तु एक बात थी की उसमे कुछ सीमा तक गुरूर भी था. सर्वगुण होने के साथ साथ राजकुमारी होने का एहसास अजंता में कुछ सीमा तक अहंकार की भावना भी जागृत कर दी थी. इकलौती और इतनी प्यारी बेटी होने के बावजूद राजा विक्रम प्रताप के सम्बन्ध अपनी पुत्री से कोई बहुत अधिक मधुर या प्रेमपूर्ण नहीं थे. वह अपने कार्यों और गतिविधियों में व्यस्त रहते और पुत्री से भेंट कम ही हो पाती थी. पर राजकुमारी अजंता अपने में स्वतंत्र रहने वाली लड़की थी और अपनी होशियारी एवं चातुर्य से उसने अपना विकास किया .राजकुमारी होने के कारण उसे सब सुविधाएँ उपलब्ध थीं. एक यह भी कारण था की राजकुमारी अजंता को कुछ सीमा तक स्वयं को अहंकारी क्यों दिखाना पड़ता था।
विभिन प्रकार के लहंगे और चोली पहनना और इनको संगठित करने का भी राजकुमारी अजंता को बेहद शौक था, उन्हें बेशकीमती आभूषण भी बहुत प्रिय थे.

इसके अलावा राजकुमारी अजंता को एक अन्य बहुत प्रिय शौक था, जंगल में घूमना, जंगली जानवरो से खेलना और वहां की प्राकृतिक सुंदरता का पूरी तरह आनंद लेना. वह कई बार अवकाश में एक दो दिन ऐसे ही जंगल घूमने जाती थी अपनी चुनिंदा सखियों के साथ और पूरी सैनिक सुरक्षा में रहते हुए. यद्यपि उसके पिता को जंगल और यहाँ तक के आदिवासी भी पसंद नहीं थे परन्तु पुत्री के हठ के आगे उनकी एक न चलती - आवश्यकता पड़ने पर भी राजकुमारी अजंता अपने पिता से झगड़ने से पीछे न हटती थी.

स्वर्णपुर के आस पास कुछ जंगल भी थे. यद्यपि उनपर मुख्यत आदिवासी रहते थे फिर भी जंगल की कुछ सम्पदा से भी राज्य को लाभ होता था. परन्तु वहां के आदिवासियों के साथ स्वर्णपुर के बहुत अच्छे सम्बन्ध नहीं थे इस वजह से स्वर्णपुर के सैनिक राज्य के सुरक्षा हेतु हमेशा जंगल की सीमा के पास तैनात रहते थे.
इसके अतिरिक्त स्वर्णपुर के प्रधान मंत्री थे धर्मदेव सिंह जो के अपने कर्त्तव्य के बेहद पक्के और ईमानदार. वरिष्ठ, ज्ञानी और समझदार होने की वजह से वह राज काज के कार्यों में राजा को पूर्ण सहयोग देते और हमेशा सबका सम्मान करते थे तथा सबसे सम्मान पाते भी थे.
पर स्वर्णपुर में ही राज दरबार में एक प्रमुख व्यक्ति और भी था जो की वहां का राज्य मंत्री था - शैतान सिंह - यह कोई बहुत अच्छा आदमी नहीं था और हमेशा विक्रम प्रताप की चाटुकारिता में लगा रहता था- राज्य और प्रजा के हित के लिए काम कम और अपने हित की ज्यादा सोचता था. वह कई मामलों में राजा विक्रम प्रताप को गलत राय देने में भी लगा रहता था. उसी एक पुत्र था सुसीम सिंह जो के पिता की भाँती ही बड़ा बदमाश और आवारा था. पर राज्य मंत्री का पुत्र होने के कारण उसे बहुत से सुविधाएँ थीं जिनका वह दुरपयोग करता था. वह राजकुमारी अजंता से ५ साल बड़ा था. जैसे जैसे राजकुमारी अजंता जवान हो रही थी शैतान सिंह के मन में उसे सुसीम की रानी बनाने और आगे चल कर राजा बनने की इच्छा बलवती हो रही थी.

सुसीम भी राजकुमारी अजंता पर नज़र रखने लगा और कभी कभी उससे छेड़ भी देता पर अजंता या तो उसपर क्रुद्ध हो जाती या फिर उसका जम कर उपहास करती थी

वह जितना राजकुमारी पर नज़र रखता , राजकुमारी उतनी ही घृणा करती थी सुसीम से और सदा या तो उस पर गुस्सा करती या फिर इतना उपहास करती की वह अंदर से जल भून जाता था
इसके अलावा राज्य के सेनापति थे वीर सिंह जो की बेहद कर्त्तव्य परायण और वीर थे और स्वर्णपुर की विशाल सेना का कुशलता पूर्वक सञ्चालन करते थे. स्वर्णपुर को चलने में प्रधान मंत्री धर्मदेव और सेनापति वीर सिंह का बहुमूल्य योगदान था.
स्वर्णपुर का राज परिवार और वहां के लोग जय महाकाल को पूजते थे और वह उनका इष्ट देवता थे.जब भी कभी राज्य में कोई उत्सव होता तो राज दरबार की प्रमुख पुजारी भ्रम देवजी हर पूजा का संयोजन करते थे और सब लोग बड़ी श्रद्धा से जय महाकाल की पूजा करते.
स्वर्णपुर का एक पड़ोसी राज्य भी था - रुद्रपुर जिसका राजा था क्रूर सिंह - अपने नाम के अनुरूप ही बेहद क्रूर , ऐयाश और कमीना इंसान.प्रजा उसे से बेहद नाखुश थी और वह प्रजा में कुत्ते के नाम से प्रसिद्द था. क्रूर सिंह की हर वक़्त यह मंशा रहती की स्वर्णपुर के राज्य को हानि पहुंचे जाये और अपना लाभ हो परन्तु उसकी इतनी शक्ति एवं परिस्थिति नहीं थी की किसी भी प्रकार से वह या उसका राज्य स्वर्णपुर के आगे टिक सके. हाँ परन्तु कुछ भूगोलिक लाभ एवं रुद्रपुर के राजा क्रूर सिंह को मिले वरदान के कारण उसे मारना एवं पराजित करना सरल कार्य नहीं था और उसमे स्वर्णपुर को भी हानि हो सकती थी।
स्वर्णपुर और रुद्रपुर की सीमा पर एक गांव पड़ता था माधोपुर. इस गांव का सबस बड़ा दुर्भाग्य यही था की वह दोनों राज्यों की सीमा पर था - इसी कारण यह इन दोनों राज्यों के बीच विवाद का कारण था.इसे राजा विक्रम प्रताप का आलस्य ही कहना चाहिए के एक बड़े राज्य के राजा होकर भी उन्होंने इस विवाद को सुलझाने का यत्न नहीं किया. इस वजह से माधोपुर के लोग भी बहुत दुखी रहते थे क्यंकि दोनों राज्य अपना अपना स्वामित्व और अधिकार इस पर जमाते थे और परिणाम स्वरुप दोनों की सेनाओं में हमेशा तना तनी रहती थी जिसका प्रभाव आम लोगों के जीवन पर पड़ता था,
यह उस दिन की बात है जब राजकुमारी अजंता कुछ दिन अवकाश पर थी सावन का महीना था और मौसम भी खिला हुआ था. महाराज विक्रम प्रताप उन दिनों राज्य के बाहर किसी दौरे पर थे और वह कल शाम को लौट थे
राजकुमारी ने कई दिनों से सोच रखा था की वह जंगल के आस पास दौरा करेगी और साथ ही माधोपुर गांव के भी दर्शन करेगी. उसने यह बात अपने पिता के आगे प्रगट नहीं की.
रजकुमारी अजंता ने सेनापति से कुछ विचार किया और कुछ चुनिंदा २० सैनकों और अपनी एक दासी के साथ रथ पर सवार होकर जंगल की सीमा पर चलने की तयारी करने लगी. तभी एक गुप्तचर ने आकर सुचना दी के रुद्रपुर के सैनिक आज माधोपुर में कुछ गड़बड़ करने की योजना बना रहे हैं और वाहन के निवासियों को सत्ता रहा हैं.
ये एक संयोग था की राजकुमारी अजंता उस गुप्तचर को जानती थी और महाराज क्योंकि महल में नहीं थे उसने उस गुप्तचर को पूछ लिया नहीं तो वह गुप्तचर महाराज के अलावा सीधा सेनापति से ही बात करता
राजकुमारी अपने अंगरक्षकों के साथ सेनापति के कार्यालय में पहुंची जो की महल एक एक गुप्त कोने में था

राजकुमारी को देखते ही सेनापति वीरसिंह आदर पूर्वक खड़े हो गए - राजकुमारीजी आप ? आपने मुझे बुला लिया होता
केशों को सुव्यवस्थित रूप सेसुसज्जित कर स्वर्णभूषण धारण किए हुए चेहरे पर कुछ कठोरता लिए हुए सुतवा नासिका ,सुराही दार गर्दन और बेहद सुन्दर राजकुमारी अजंता उनके सम्मुख खड़ी थी.
राजकुमारी ने अपने अंगरक्षकों से बाहर रुकने को कहा और वह अंदर चली गयीं
राजकुमारी - सेनापति जी हमे अभी माधोपुर चलना होगा अपनी विशेष सैनिक टुकड़ी के साथ - और उसने गुप्तचर वाली बात बता दी
वीरसिंह - पर राजकुमारी माधोपुर में इस प्रकार की किस्से होने आम बात है और हम लोग जब तक की उनके सैनिक हमारे राज्य में नहीं प्रवेश न करें हमे अपना समय _ __
राजकुमारी ने उनकी बात बीच में काट दी - यह नक्शा देखें सेनापति जी - हमे आश्चर्य है की आप यह बात बोल रहे हैं - माधोपुर का अधिकांश भाग हमरे राज्य में ही है
वीर सिंह - हाँ राजकुमारी परन्तु महाराज ने कभी इस विषय में _ _ _ _
राजकुमारी - सेनापति जी यह मेरा आदेश है की आप इस समय मेरे साथ माधोपुर चलें - महाराज को उत्तर देने का दायित्व मेरा होगा - आप पर कोई आंच नहीं आएगी
वीरसिंह - पर राजकुमारी आप स्वयं क्यों जाएँगी हम खुद सैनिको के साथ _ _ _
राजकुमारी - वीर सिंह जी में आपके साथ जाउंगी अर्थात जाउंगी - शीघ्र प्रस्थान करना होगा

उधर माधोपुर में -
एक ग्रामीण - अरे यह रुद्रपुर के सैनिक फिर से आ गए हमे सताने - इनका कर भरते भरते हमारे तो घर ही खली हो जायेंगे
दूसरा - अरे आहिस्ता बोल भाई - किसी सैनिक ने सुन लिया तो _ _
और वाकई एक सैनिक ने सुन लिया और उन दोनों को घसीटता हुआ उपसेनापति जलाल सिंह के पास ले गया - रुद्रपुर का उप सेनापति जलाल सिंह आज टुकड़ी के साथ था - अपने राजा की तरह वह भी एक दम धूर्त ऐयाश और कमीना इंसान था
जलाल सिंह - तुम्हारा सIहस कैसे हुआ हमारे विरोध में कुछ भी कहने का - सैनिको - इन दोनों को दस दस कोड़े लगाए जाएं
जैसे ही दो सैनिक कोड़े लेकर आगे आये एक तीर कही से तेज़ी आया और उनके आगे आकर धरती में धंस गया
गांव वासियों ने देखा और सैनिकों ने भी जब उस दिशा में देखा तो चकित रह गए - माधोपुर गांव की एक लड़की जिसका नाम धर्मI था और उम्र यही कोई 19-20 साल एक छोटे से धनुष हाथ में लिए थी और उसपर दूसरा तीर चढ़ा रही थी -
धर्मा को देखते ही जलाल सिंह चकित रह गया - धर्मI एक गौर वर्ण की सुन्दर और बेहद गदराये शरीर की स्वामिनी थी - उसने लाल और हरे रंग से मिश्रित एक चोली पहनी थी और उसी रंग का एक घाघरा जिसे थोड़ा सा मोड़कर उसने धोती की आकIर में किया था. उसकी लम्बी कमर नंगी थी और उसकी गोल बड़ी सी नाभि भली भाति उसके घाघरे के काम से काम तीन इंच ऊपर दृष्टिगोचर थी- इस समय धर्मा के चेहरे पर गुस्सा था - रुद्रपुर के सैनिको - बहुत अत्याचार सहन कर लिया हमने - अब और नहीं - कह कर उसने दूसरा तीर छोड़ा जिससे की एक सैनिक घायल हो गया

पर तभी जलाल सिंह ने कट्टर फेंकी और धर्मा का धनुष टूट कर गिर गया - अब जलाल सिंह अपना घोडा धर्मा क आसपास घूमने लगा - उसे देखते ही उसकी शैतान आँखों में वासना उतरा आयी - उसने अश्लीलता से आँख मारी - वIह माधोपुर वासियो वIह - यह इतना गदरा माल कहाँ छुपा रखा है - वैसे तो तुम सब लोग गरीबी का रोना रट हो पर यह तो - है कई कातिल जवानी - क्योंकि मेरी जान - आजा मेरे पास और मेरे लंड पे सवार हो जा - तेरी चूत ऐसे गरम करूंगा की उम्र भर मेरा लंड चुसना मांगेगी
धर्मा का गुस्सा चर्म सीमा पर था - कमीने बदज़ुबान तेरा सIहस कैसे हुआ


ओह्ह - हां हआ - जलाल सिंह ज़ोर से हंसा और उसने तलवार की नोक से धर्मा की चोली का बन्धन खोल दिया - फलस्वरूप उसकी चोली उसके वक्षों पर ढीली पढ़ गयी - धर्मा ने तुरंत अपने दोनों हाथों से अपना सीना धाप लिया और अब उसके चेहरे से बेबसी टपकने लगी - वह याचना के स्वर में चिल्लाई - क्या माधोपुर में कोई पुरुष नहीं है जो स्त्री की लाज बचा सके
जलाल सिंह और उसके सैनिक ज़ोर से हसे - तुझे आज सबके सामने रंडी बनाकर छोड़ेंगे और फिर देखेंगे माधोपुर में किसका इतना सiहस है की - _ _ _ _

और तभी दो तीर सनसनाते हुए आये और जलाल सिंह के दो सैनिको को चीरते हुए निकल गए
जब सबने विपरीत दिशा में देखा तो सब चकित हो गए - स्वर्णपुर की राजकुमारी अजंता के हाथ में धनुष था और यह उसी के निशाने का कमाल था
धर्मा भी चकित हो गयी - सबसे पहले उसने अपनी चोली ठीक की
वह हैरत से उस 18 साल की लड़की जो की राजकुमारी अजंता के अतरिक्त कोई और ना थी और जिसके मासूम और अत्यधिक सुन्दर चेहरे से बहुत ही भोलापन टपकता था , पर इस समाया एक रणचंडी से काम नज़र न आ रही थी
वह दो तीर चला चुकी थी और तीसरा तीर छोड़ने की तैयारी में थी -
कुछ देर बाद रुद्रपुर और माधोपुर के सैनिक एक दूसरे के आस पास थे
जैसे ही उसने स्वर्णपुर के सैनिक और राजकुमारी को देखा उसके चेहरे पर हैवानियत दिखने लगी - वीरसिंह आज फिर स्वर्णपुर की सेना हमारे कार्य में विघ्न डालने आ गयी _ __
इस से पहले की वह बात पूरी करता राजकुमारी अजंता अपने पूरे वेग से चिल्लाईं - जलाल सिंह - वह ज़ोर से चीखी - इतने ज़ोर से की गांव वाले विस्मित हो गए - यहाँ तक की स्वर्णपुर के सैनिक भी - अच्छा होगा अगर अपनी इस टुकड़ी को यहाँ से ले जाओ और आईन्दा माधोपुर की और मत देखना - वरना जो हश्र होगा तुम्हारा , तुम्हारे राजा भी कांप उठेंगे
जलाल सिंह पहले तो चकित होकर राजकुमारी अजंता को देखता रहा - उसके पश्चात उसने राजकुमारी की सर से पांव तक निहारा - राजकुमारी अजंता ने इस समय एक सुनहरी चोली और एक लाल रंग का बेशकीमती लेहेंगा जिसमे सोने और हीरे जेवरात की कढ़ाई हुई थी, पहना था. इसके मध्य में राजकुमारी नंगी कमर थी और बीच में एक गोल प्यारी नाभि - राजकुमारी इतनी सुन्दर थी की कोई भी उसे देखता तो बस -
उसे इस प्रकार न उत्तर देते देख राजकुमारी ने फिर अपनी चेतवानी दोहराई - अब जलाल सिंह बोल पड़ा - राजकुमारी अजंता - स्वर्णपुर एक बड़ा और समृद्ध राज्य है. शायद इस कारण तुम अपना अधिकार दिखने यहाँ आयी हो. वरना महाराज विक्रम प्रताप हमारे कार्यों में अधिक नहीं बोलते - उन्हें ज्ञात है की रुद्रपुर से युद्ध में जीतना संभव नहीं
अब ज़ोर से हंसने की बारी राजकुमारी अजंता और स्वर्णपुर के सैनिको की थी - दिन में भी स्वपन देख रहे हो जलाल सिंह - सेनापति वीर सिंह ने कहा

जलाल सिंह जिसके मन में राजकुमारी को देखते ही शैतान घर कर गया था अब बोल पड़ा - आपकी राजकुमारी बहुत बोल रही हैं - इनसे कहो जाएँ और जIकर अपनी सखियों के साथ खिलोनो से खेले और बड़ो के कामों में हस्तक्षेप न करें अन्यथा इसका परिणाम _ _ _
राजकुमारी अजंता क्रुद्ध हो गयीं -जलाल सिंह – तुम ने राजकुमारी अजंता का उपहास किया है - इसका परिणाम जानते हो? - अजंता का मासूम और सुन्दर चेहरा गुस्से से लाल हो गया -
जलाल सिंह - हमे आँखे मत दिखाओ राजकुमारी - जलाल सिंह से टकराने का अंजाम तुमने अभी देखा नहीं है
राजकुमारी अजंता ने धनुष रथ में छोड़ा और म्यान से तलवार निकाल ली - जलाल सिंह - हो जाये युद्ध - मैं तुम्हे ललकारती हूँ
ह ह ह - जलाल सिंह ज़ोर से हंसा - जाओ जाओ राजकुमारी - तुम मुझसे युद्ध करोगी - खुद लहँगा उठाकर पेशाब करना तो अभी -२ सीखा है - जाओ जाओ - दो पल में ही तुम्हारी कच्छी इन माधोपुर की लोगों के आगे उतार दूंगा - कल की लड़की - माधोपुर के सैनिक अश्लीलता से हसे और स्वर्णपुर के सैनिकों ने क्रुद्ध होकर तलवारें लहरायीं -
वीर सिंह गुस्से से बोले - जलाल सिंह तुम्हारा यह दुस्साहस की तुम हमiरी राजकुमारी के बारे में अश्लील शब्द _ _ _
राजकुमारी - वीर सिंह जी बस - आप चिंता न करें - ज़रा में भी देखूं की इस शैतान की संतान में कितना दम है
और राजकुमारी अजंता हाथ में तलवार लहराती हुई रथ से नीचे कूद पड़ीं.- जलाल सिंह आ तुझे बताती हूँ की लहँगा उठाकर कैसे पेशाब किया जाता है - तू आज के बाद अपना नाडा बंद करने की हालत में नहीं होगा.- कमीने घटिया इंसान - मैं आज प्रमाणित कर दूँगी की तू एक नामर्द है
देख नहीं रहा - रुद्रपुर के रथ घोड़े चलता हैं पर स्वर्णपुर के रथ शेर चलाया करते हैं - स्वर्णपुर में शेर गलियों में घूमते हैं कम्बख्त
जलाल सिंह के क्रोध की सीमा न थी - वह भी तलवार लेकर घोड़े से कूद पड़ा - स्वर्णपुर के सैनिक जैसे ही अपनी राजकुमारी की रक्षा हेतु आगे आने को हुए , अजंता ने उन्हें इशारे से रोक लिया - कोई बीच में नहीं आएगा - यह हमारा आदेश है
और तभी दोनों की तलवारें एक दुसरे से टकराने लगी
दोनों में युद्ध होने लगा
तभी जलालसिंह ने एक दांव खेल और तलवार झुका कर राजकुमारी पर नीचे से वार करने की सोची - परन्तु राजकुमारी ने फुर्ती का प्रदर्शन करतेहुए एक छलांग लगाई और जलाल सिंह पर वार करके उसकी पगड़ी उछाल दी.
राजकुमारी का लहँगा कुछ ऊपर उठा पर उसने इसके परवाह न की
युद्ध जारी था
तभी लड़ते लड़ते दोनों एक ढलान के पास आ गए और नीचे की और कूद गए - अब आस पास केवल कुछ बड़े बड़े पत्थर थे और ढलान के नीचे होने के कारण उन्हें कोई नहीं देख पा रहा था - बस सनसनाती तलवारों की आवाज़ आ रही थी
अचानक राजकुमारी ने जलालसिंह पर ज़ोर से वार किया - जलालसिंह ने भी प्रतियुत्तर में ज़ोर से तलवार घुमाई और दोनों के हाथ से तलवारें छूट कर दूर जा गिरीं
एक पल दोनों ने एक दुसरे को देखा - राजकुमारी जैसे ही तलवार लेने को लपकीं , जलालसिंह ने उसका रास्ता रोक लिया - राजकुमारी अजंता - तुमने मुझे नामरद बनाने की बात की - देख आज में तेरा क्या हश्र करता हूँ - और उसने राजकुमारी को धक्का दिया - राजकुमारी पीठ के बल गिरीं और सँभालने के प्रयास में राजकुमारी की टांगें ऊपर उठ गयीं, जिससे उनका लहँगा काफी हद तक घुटने के ऊपर सरका गया - राजकुमारी की सूंदर, गोरी , मुलायम और स्वस्थ टांगें देख कर जलाल सिंह जैसा शैतान तो बेकाबू हो गया उसके पIयजामे में हलचल होने लगी और उसने अपना लंड थाम लिया - कुत्ते की तरह उसकी जीभ लपलपा गयी - वIह अद्भुत . अपने नाम के अनुरूप अजंता ही हो।
और वासना से वशीभूत होकर वह राजकुमारी पर टूट पड़ा और इससे पहले की वह संभालती उसने राजकुमारी के दोनों कोमल गुदगुदे हाथ अपने सख्त और खुरदरे हाथों से दबा दिए और शरीर के आर पार ले आया
राजकुमारी के कंठ से हलकी सी चीख निकली.
जलाल सिंह - वह बोलीं - छोडो मुझे
जलाल सिंह - हूँ - बच्ची हो - पर अच्छी हो -यह कह कर वह राजकुमारी पर झुक और उसे चूमने लग गया - राजकुमारी अपना चेहरा इधर उधर करने लगीं पर कोई लाभ न हुआ
उसने अजंता के मुख पर चुंबनों की भीषण वर्षा कर दी और उसका निचला अंग एक विकराल रूप धारण करने लगा
राजकुमारी के शरीर ने हरकत की और वह कुछ घूमीं - जलाल सिंह ने अवसर का लाभ उठाया और राजकुमारी की चोली की डोर खोल दी. अब केवल एक छोटा सा सुनहरी फीता था जो की उनकी चोली को उनके शरीर पैर रोके हुए था
जलाल सिंह ने वह फीता खिसकाया और राजकुमारी की चोली उतार कर फेंक दी
अब अजंता का सीना नंगा हो गया और उसकी उभरती हुई छातियां एक दम बाहर आ गयी. जलाल सिंह उसके गुलाबी स्तनाग्रों से खेलने लगा और उसके उरोज मसल दिए.
वह अजंता की ठुण्डी (नाभि) में ज़ोर से उँगलियाँ घूमने लगा जिससे अजंता को दर्द हुआ और वह हलके से चीखी - क्यों राजकुमारी अभी से यह संतरे बन गए हैं आगे चल कर तो बड़े बड़े खरबूजे खाने को मिलेंगे - और उसने राजकुमारी के वक्ष दबाने शुर कर दिए -हाय अजंता तेरे यह दुधु.
अजंता के गोल उरोज किसी पके हुए संतरे के भाँति पुष्ट थे. अजंता ऊपरी भाग से निर्वस्त्र थी
धीरे धीरे उसका एक हाथ राजकुमारी की कमर पर खिसकने लगा
इस बीच वह अपना पजामा खोल चूका था और उसका तना हुआ लंड बाहर की और निकल गया
मैं इससे तेरी कुंवारी चूत फाड़ दूंगा राजकुमारी - तो कई दिन पेशाब करते हुए रोयेगी
उसके बाद उसने अपने दोनों हाथ उसकी कमर के इर्द गिर्द डाल कर अपने मुँह से उसकी नाभि को चबाना शुरू कर दिया
चूमते हुए जलाल सिंह के होंठ नीचे के ओर गए और उसने लहंगे के ऊपर पेट और नाभि के बीच के हिस्से को चबाना शुरू कर दिया. राजकुमारी और चीखी.
पर जलाल सिंह ने एक बात नहीं गौर की - राजकुमारी अजंता उसका अत्यधिक विरोध नहीं कर रही थी.

वह बेखबर उसे चूमते रहा और अपना एक हाथ राजकुमारी के उठे हुए लहंगे में डाल डाल दिया –
जलाल सिंह की उँगलियाँ राजकुमारी अजंता की लाल रंग की कच्छी के ऊपर घूमने लगी
अजंता को अपने जनांग में कुछ हरकत महसूस हुई. - फिर उसने कुछ गौर किया और सहसा उसकी टाँगे तेज़ी से मुड़ी

जलाल सिंह कुछ समझता इस से पहले उसकी सुनहरी चप्पल का वार जलाल सिंह के चेहरे पर ज़ोर से पड़ा
राजकुमारी की चप्पलों में जो की सुनहरी थीं , कोने पर कुछ नुकीले कील जैसे हिस्से थे जो जलाल सिंह के चेहरे को छलनी कर गए.
राजकुमारी ने फिर से वार किया और वह बिलबिला गया.
अजंता फुर्ती से उठी और अपनी तलवार उठाकर जलाल सिंह के गुप्त अंग पर वार किया -
आआआआआहहआआह्ह्ह
एक खून का फव्वारा छूटा और जलाल सिंह दर्द से चीख उठा
राजकुमारी अजंता मुस्कुरा उठी - उसने सबसे पहले अपनी चोली उठायी और पहन ली
अभी पीठ के पीछे हाथ डालने से वह बहुत कस कर अपनी चोली न पहन सकी पर फिर भी -
उसने किसी तरीके उसका पयजामा उसके जलाल सिंह के खून से लथ पथ अंग पर लपेटा और उसे खींचती हुई ऊपर ले आयी - रुद्रपुर के सैनिको - सम्भालो अपने इस उपसेनापति को - मुझे पेशाब करना सीखने चला था - अब यह उम्र भर पेशाब करते हुए मुझे याद करेगा
जलाल सिंह दर्द से चीख रहा था
रुद्रपुर के सैनिक रोष से भर गए और तलवारें तान ली पर तभी राजकुमारी ने आदेश भरे स्वर में कहा - अगर रुद्रपुर के सैनिको ने कोई भी हरकत की तो ध्यान रहे - मेरे सैनिक तैयार हैं.
और राजकुमारी अजंता ने ज़ोरदार आवाज़ में आदेश दिया – आक्रमण
स्वर्णपुर के सैनिक तीर और तलवारों से रुद्रपुर की सेना पर टूट पड़े और कुछ ही पल में रुद्रपुर के सैनिक हथियार डाल कर भागते नज़र आये.
स्वर्णपुर के सैनिकों ने अपने कुछ रथ में लगे शेरो का भी उपयोग किया
फलस्वरूप रुद्रपुर की सेना की टुकड़ी उनके आगे न टिक सकी.
रुद्रपुर के सैनिकों को भागते देख कर माधोपुर के लोगों में प्रसन्नता के भाव नज़र आये और उन्होंने राजकुमारी की जय जयकार की
परन्तु राजकुमारी अजंता ने एक बात गौर की , की माधोपुर के लोगों में वह ख़ुशी और उल्लास नहीं था जिसकी उसने आशा की थी.
सब लोग चकित होकर इस 18 साल की लड़की जिस पर यौवन खिलना शुरू हुआ था और जिसके चेहरे पर बाला की खूबसूरती थी - इस प्रकार एक भीमकाय दिखने वाले शैतान को कैसे पराजित कर दिया. राजकुमारी की कम उम्र के साथ साथ उनका चेहरा इतना भोला था की उनसे इतना अधिक क्रोध और इतनी वीरता एवं युद्ध कौशल की भी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी.
इसके बाद राजकुमारी अजंता लौट कर अपने रथ पर चढ़ने लगीं तो उनको एक आवाज़ आयी - ठहरिये राजकुमारीजी

अजंता ने जैसे ही पलट कर देखा , तो पाया की और कोई नहीं धर्मा ही उन्हें आवाज़ दे रही थी
अजंता - अरे धर्मा तुम. राजकुमारी के मासूम चेहरे पर मुस्कान खिल उठी.
धर्मा - अच्छा है आपने मुझे पहचान लिया. मैं आजकल यहीं माधोपुर में रह रही हूँ.
अजंता - मैंने भी ऐसा ही सुना था धर्मा - फिर आस पास के लोगों की और देखते हुए - शायद इस गांव में कोई भी पुरुष नहीं बस्ता - पर तुम एक साहसी लड़की हो
धर्मा - राजकुमारीजी शायद आप सच कह रही हैं (उसने भी लोगों के झुके हुए सर देख कर कहा) -परन्तु क्या राजमहल ने कभी आज तक माधोपुर जैसे गांव जो की वास्तव में स्वर्णपुर का ही हिस्सा मन जाये , समस्याओं पर ध्यान दिया?
और साथ ही उसने राजा विक्रम प्रताप की इस गांव के प्रति उदासीनता का बखान करना शुरू कर दिया
अजंता (कुछ क्रुद्ध स्वर में ) - धर्मा _ _ _ मत भूलो की तुम इस राज्य के महाराज विक्रमप्रताप सिंह जो की हमारे पिता हैं उनके बारे में बोल रही हो. तुम मेरी पुरानी सखी हो इसका तात्पर्य यह नहीं की _ _
धर्मा - राजकुमारीजी वही तो मैं कह रही हूँ - अगर राजा विक्रम प्रताप हमारे राजा है , तो हमIरी समस्याओं को ध्यान क्यों नहीं दिया जाता - आजा हम रुद्रपुर के सैनिको के अत्याचार का आये दिन शिकार होते हैं .
जब कर वसूलने का समय होता है तो आपके अधिकारी यहाँ आते हैं और पूरा कर वसूलते हैं - पर हमारी लूटी हुई फसलों, घर और जान माल की सुरक्षा का कोई नहीं सोचता सिर्फ इस लिए क्योंकि हम स्वर्णपुर की सीमा से कुछ हट कर हैं.
राजकुमारी अजंता कुछ प्रभावित हुईं - ठीक है धर्मा हम महाराज से इस विषय पर अवश्य चर्चा करेंगे. तुम चिंता न करो
और हाँ ज़रा कुछ पल के लिए हमारे साथ आओ
और वह धर्मा को रथ के पीछे ले गयी
धर्मा - क्या बात है राजकुमारी आप मुझे यहाँ क्यों ले आयीं.
अजंता - धर्मा - २ आवश्यक कार्य हैं . सर्वप्रथम मेरी चोली पीछे से ढीली है इसे कस कर बाँधा दो,
और वह अपनी गोरी और चमकदार पीठ धर्मा की और कर के खड़ी हो गयी
धर्मा ने मुस्कुराते हुए चोली राजकुमारी की चोली ठीक कर दी -
क्या बात है राजकुमारी जी यह चोली _ _
अजंता - हाँ उस जलाल सिंह से द्विंद्व युद्ध हो गया था - बहुत प्रयत्न करने के बाद सिर्फ हमारी चोली ही उतार सका –

धर्मा - तो क्या उसने आपके साथ -
अजंता - उसे मेरे संतरे बहुत पसंद आ गए थे - इसी लिए अपना केला बदले में भेंट करने चला था
धर्मा हंस पड़ी - आप बहुत ही नटखट हैं राजकुमारी जी - पर अब तो वह बेचारा जलाल सिंह पेशाब करते समय आपको याद करेगा.
अजंता - और हाँ यह राजकुमारीजी क्या लगा रखा है. मेरा नाम भी स्मरण नहीं क्या? अरे हाँ मेरा दूसरा कार्य इसी से सम्बंधित है. ज़रा कोई ठीक सी जगह बताओ - अचानक ही बहुत ज़ोर से पेशाब आने लगा गया है.
धर्मा - वही झाडी के पीछे कोने में. पर अचानक क्यों.
अजंता ने चंचलता पूर्वक एक आंख दबाई - वह जलाल सिंह था न - उसने २-३ बार मेरा लहंगा उठाकर वहीं उँगलियाँ चलाईं. क्या करून अब हालत.
धर्मा फिर हंसी - कोई बात नहीं आप कर लीजिये पर जल्दी - आपके सैनिक आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं.

अजंता जल्दी से झाड़ियों में जाकर चुप गयी और अपना लहंगा ऊपर उठा लिया. उसके पश्चात उसने अपना लाल रंग का भीतरी वस्त्र (कच्छी) भी अपनी गोरी गुलाबी टांगों से नीचे सरकियी और पेशाब करने लगी. पेशाब करके उसने हल्का महसूस किया और फिर अपने कपडे (लहंगा) इत्यादि ठीक किया और वापस धर्मा के साथ लौट आयी
राजकुमारी अजंता - सेनापती वीर सिंह जी ज्ञात रहे - धर्मा हमसे जब भी कभी मिलने आना चाहे राजमहल के दरवाज़े इसके लिए खोल दिए जाएं.
सारे माधोपुर निवासी उसे गौर से देखने लगे- आखिर धर्मा ने इस अहंकार से भरी राजकुमारी पर क्या जादू किया (राजकुमारी अजंता अपने अहंकार और बेहद हठी स्वभाव के लिए भी प्रसिद्द थी).
तभी राजकुमारी ने सेनापति वीर सिंह को अपने रथ में साथ चलने को कहा
सेनापति वीर सिंह रथ में बैठ गए और अन्य रथों के साथ (जो की सब शेरो के द्वारा चलित थे) सेना की टुकड़ी वापस स्वर्णपुर की और लौट चली.
रास्ते में राजकुमारी अजंता ने सेनापति को सम्बोधित किया - वीरसिंहजी पिताजी कल शाम को लौट रहे हैं - हम उससे पहले कल जंगल का एक दौरा करना चाहेंगे और वहां पर आदिवासियों से मिलना चाहेंगे. उसके पश्चात हम महाकाल के दर्शन करके वापस महल में लौटेंगे और रात्रि भोजन से पहले पिताजी से भेंट करना चाहेंगे.
वीरसिंह - वह तो ठीक है राजकुमारीजी परन्तु क्या आपकी सुरक्षा की दृष्टि से यह उचित होगा की आप आदिवासियों से मिलने स्वयं जाएं?
अजंता - आप और सेना की टुकड़ी हमारे साथ जायेंगे. परन्तु ध्यान रहे हमारी इस बात को गुप्त रखा जाये.और जंगल के आस पास के सुरक्षा अधिक कर दी जाये.
वीरसिंह ने स्वीकृति में सर हिला दिया - आपके आदेश का पालन होगा राजकुमारीजी.
इतने में महल आ गया और राजकुमारी और वीरसिंह एक दुसरे का अभिवादन करके अपने - अपने कक्ष में चले गए.
राजकुमारी का अभिवादन करने उनकी तीन दासियाँ तुरंत पहुँच गयीं.
अभी राजकुमारी महल के गलियारे से गुज़र ही रही थीं की उन्हें कही कुछ गिरने की अवाज़ा आयी - देखा तो एक सोने का बरतन कहीं ज़मीन पर गिर गया था - जब राजकुमारी ने नज़र उठाकर देखा तो उसका मन घृणा से भर उठा - महामाया देवी तुम? क्या यह आवश्यक है की तुम मुझे अपना यह मनहूस चेहरा रोज़ दिखाओ? तुम्हे ज्ञात है की में तुमसे कितनी _ _ _ _
महामाया - घृणा करती हो (महामाया एक गोरे रंग की प्रौढ़ एवं कुछ हद तक थुलथुल शरीर की स्वामिनी थी. उस अधेड़ औरत की आँखों में एक अजीब वहशत और किसी को भी भयभीत कर देने वाले भाव थे. उसके चेहरे पर मासूमियत तो नाम मात्र की भी न थाई बल्कि वह दिखने में ही कोई बेहद कपटी और तेज़ तरार औरत प्रतीत होती थी वह किसी समय कुछ सुन्दर भी रही होगी, परन्तु अब उम्र ने उसके चेहरे पर बुढ़ापा दिखाना शुरू कर दिया था) - क्या बात है अजंता तुम _ ____

अजंता घृणा और क्रोध से भर उठी - राजकुमारी अजंता कहो अशिष्ट नारी. तुम्हारा साहस कैसा हुए मुझे इस प्रकार पुकारने का. दूर हो जाओ मेरी निगाहों से और मत आया करो मेरे सामने.
महामाया देवी पैर पटकती हुई गुस्से में अपने कक्ष में घुस गयी - देख लूंगी तुम्हे राजकुमारी अजंता - तुम्हारा यह अहंकार एक दिन मैंने न तोडा तो _ _ _ _ _अपने चरणों में तुम्हे झुका के रहूंगी.

जैसे ही राजकुमारी अपने कक्ष में पहुंची उनकी दासियों ने कहा - आप शांत हो जाएं राजकुमारीजी - कृपया क्रोध कर अपने मन को ख़राब न करें
राजकुमारी हलके से मुस्कुरायी - हाँ तुम लोग ठीक कह रही हो
एक दासी - आप के स्नान का प्रबंध करें?
राजकुमारी - नहीं आज में अपने निजी स्नानघर में नहाउंगी
और कक्ष में घुसते ही राजकुमारी अजंता ने खुद को एक प्रकार बिस्तर पर पीठ के बल फेंक ही दिया.

राजकुमारी विचारों में खो गयी और आज के घटनाक्रम के बारे में सोचने लगी - उनकी निगाहें अपने विशाल और खूब भली भाँती सुस्सजित शायना कक्ष की छत पर तिकी थीं
फिर थोड़ी देर के पश्चात् वह उठीं और अपने कमरे में लगे एक बहुत बड़े (लगभग आदम कद)आईने के आगे आ कर खड़ी हो गयीं
उसने ने अपना सुनहरी रंग का दुपट्टा खिसका कर एक और रख दिया और उनके हाथ अपनी पीठ की ओर घूम गए.
उसने अपनी चोली की गांठ खोल दी और दुसरे हाथ से उसे उतार कर एक ओर रख दिया
राजकुमारी अजंता के संतरे की तरह एक दम गोल वक्ष उभरे हुए बाहर निकल आये ओर आईने में दृष्टिगोचर हो गए
उसके उगते हुए उरोज उसके खिलते यौवन का बहुत ही सुन्दर प्रतिक थे - अपनी उम्र की लड़कियों की अपेक्षा राजकुमारी का वक्षस्थल अधिक उन्नत था

कुछ सोच कर उनके चेहरे पर एक हलकी सी चंचल मुस्कराहट आ गयी - बेचारा जलाल सिंह
राजकुमारी अब बिलकुल एक ऐसी आयु में थी जिसके बाद उसका यौवन और खिलना था - इस परिवर्तन के समय पर ही आज किसी पुरुष ने उसका शरीर छुआ था भले ही वह जलाल सिंह जैसा कोई नीच इंसान ही क्यों न हो
पर राजकुमारी को यह सोच कर उत्तेजना हो रही थी की कल उसके सपनो का राजकुमार जब उसे प्यार से उसका बदन छुएगा तो कैसा एहसास होगा
- वह कोई बहुत वीर और साहसी और शायद संसार का सबसे अधिक सुन्दर और सुदर्शन , पराक्रमी पुरुष होगा - अपने नंगे वक्ष स्थल को निहारती हुईं वह धीरे से बुदबुदा उठी - और कोई ऐसा जो मुझे परास्त कर सके

पर तभी जैसे राजकुमारी को एक बहुत बड़ा झटका लगा - अचानक ही उनके बिस्तर के पीछे से ज़ोर से निर्लज्जता पूर्वक हँसता हुआ स्वर सुनाई दिया
राजकुमारी – तुमममममम
वह वाह राजकुमारी वाह - अद्भुत सौंदर्य ??
सुसीम बेहद निर्लज्ज होकर वहां खड़ा तालियां बजाने लगा - और जैसे ही उसकी दृष्टि राजकुमारी के नंगे उरोजों पर पड़ी उसकी आँखे फ़ैल गयीं और एक हाथ से वह अपना निचला अंग धोती में टटोलने लगा जो की राजकुमारी को इस अवस्था में देख कर कड़क हो गया था.
राजकुमारी ने तुरंत अपना नंगा सीना अपने दोनों हाथों से ढांप लिया और ज़ोर से चिल्लाई - सुसीम तुम्हारा साहस कैसे हुआ हमारे कक्ष में इस प्रकार अंदर आने का - और किसने इस बात की अनुमति दी _ __
सुसीम - राजकुमारी तुम अच्छी तरह से जानती हो की सुसीम को जहाँ जाना हो वह वहां पहुँच जाता है - और हाँ रही बात अनुमति की तो समझ लीजिये राजकुमारी अजंता की सुसीम का कराया अनुमति माँगना नहीं अपितु आदेश देना है - और हाँ आपको इस रूप में देख कर मेरी दीवानगी आपके लिए कई गुना बढ़ गयी है - क्या अन्तर पड़ता है - भविष्य में हमारा विवाह तो होना ही है - तो क्यों न हम आज ही _ _ _ और उसके हाथ राजकुमारी को थामने के लिए आगे बढे.

और तभी सुसीम ज़ोरों से कराह उठा और अपना मुख पकड़ कर कक्ष के फर्श पर बैठ गया.
राजकुमारी अजंता ने पता नहीं कहाँ से एक कट्टार निकली और सुसीम की नाक के पास सीधा चेहरे पर वार किया - उसके चेहरे से रक्त बह निकला और सुसीम की चीखें निकल गयीं - आअह्ह्ह आआह्ह्ह्ह ोुउउउउउउउउ
राजकुमारी ने अपनी चोली धारण की और उसे अपने वक्ष पर ठीक से समतल किया - उसके बाद दुपट्टा कंधे पर लेकर सुसीम को आदेश भरे स्वर में बोली - तुम पिछले दरवाज़े से स्वयं जाते हो या बुलाऊँ सैनिको को.
वह कहती रहीं - अच्छा हो सुसीम यह उद्दंडता दोबारा न हो - अन्यथा तुम एक बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाओगे
आज के बात हमारे निकट आने का अर्थ होगा अपनी मृत्यु को दावत देना
राजकुमारी ने कट्टार पून: थाम लिया और एक रणचंडी की भाँती नज़र आ रही थीं - यहाँ से चुप चाप जाओगे और बाहर इस चोट का कारण कुछ और बताओगे तो तुम्हारा ही भला है - अन्यथा राजकुमारी के कक्ष में बिना अनुमति प्रवह करने औरउनसे दुर्व्यहवार करने का दंड क्या होगा तुम भली भाँती परिचित हो.
सुसीम लहूलुहान और पीड़ित तो था ही साथ में वह 18 साल की इस कन्या का यह प्रचंड रूप देख कर अत्यंत चकित भी हो गया - 25 साल के सुसीम ने सोचा की वह इस छोटी सी लड़की पर आराम से नियंत्रण पा लेगा परन्तु उसकी सब आशाओं पर पानी फिर गया - वह अपने लहू लुहान चेहरे को लेकर बाहर चला गया और सबको चोट लगने को कोई अन्य कहानी बता दी.
राजकुमारी आज की घटनाओ से प्रसन्न कम और क्षुब्ध अधिक थीं. उन्हें कई दिनों से कुछ ऐसा प्रतीत होने लग गया था मIनो उनके और महाराज के इर्द गिर्द इस राजमहल में कुछ बहुत अनुचित और संदिग्ध हो रहा है जो की उनके लिए आगे चल कर संकटमय हो सकता है .
राजकुमारी ने अपने कल के जंगल दौरे के बाद होने पिता से रात को बात करने का निश्चय किया.

उसके बाद राजकुमारी अपने निजी स्नानागार में आ गयीं और सब कपडे उतार दिए ।उन्होंने अच्छी तरह से स्नान किया
और रात्रि भोजन लेकर अपने शयन कक्ष में आ गयी.
कुछ देर के पश्चात वह गहरी निद्रा में थीं
लेकिन उस से पहले उन्होंने अपने अंगरक्षकों और दासियों को यह आदेश दे दिया की कोई भी आज के बाद बिना उनके आदेश के उनके कमरे में प्रवेश नहीं करेगा
sujitha1976
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Re: maharani aur tarzan

Post by sujitha1976 »

अपडेट २ - राजकुमारी की जंगल यात्रा
अगले दिन राजकुमारी ने पूर्व कार्यक्रम के अनुसार सेनापति वीर सिंह के साथ सुबह ही जंगल में निकल जाने का निश्चय किया (न जाने क्यों वह यह यात्रा अपने पिता के आने से पूर्व करना चाहती थीं). उन्होंने वीर सिंह को यह भी कहा की वापसी में वह एक बार अपने इष्ट देवता महाकाल के दर्शन अवश्य करेंगी.
राजकुमारी ने जैसे ही राजमहल से बाहर अपना कदम रखा - वहां सुसीम आ गया - क्यों राजकुमारी कैसी हैं आप - अजंता ने घृणा और अपेक्षा की मिली जुली भावनाओ से वशीभूत होकर अपना मुख फेर लिया –

उनकी आँखों में सुसीम को देखते ही क्रोध उतर आया, इससे पहले की राजकुमारी अजंता कुछ कहतीं, सुसीम ने कहा - राजकुमारी आपका इस प्रकार आदिवासियों में जाना उचित नहीं, आप महाराज को बिना बताये जंगल और आदिवासियों के बीच जा रही हैं महाराज को यह बात कतई पसंद नहीं आएगी - वह निम्न जाती के लोग हैं और राजमहल वालों का आदर नहीं करते- आपके लिए उचित होगा की आप राजमहल में न जाएं.

राजकुमारी ने एक गहरी नज़र सुसीम पर डाली और उसके पश्चात पास ही खड़े एक घुडसवार (जो उनकी टुकड़ी में ही अंगरक्षक था) को आदेश दिया - उतरो
घुडसवार - परन्तु राजकुमारी आपका रथ तो सामने तैयार है
राजकुमारी - हमने कहा – उतरो


और इससे पहले की कोई कुछ भी समझ पाता राजकुमारी तुरंत घोड़े पर स्वर हो गयीं और उसकी लगाम खींची. उनके दूसरे हाथ में एक नंगी तलवार थी - राजकुमारी इस समय कुछ क्रुद्ध थीं और उनका उभरा हुआ सीना उठने बैठने लगा.
उनका घोडा सुसीम के इर्द गिर्द चक्कर लगाने लगा. सुसीम राजकुमारी की इस हरकत को चकित होकर देख रहा था. तभी राजकुमारी का हाथ लहराया और तलवार की नौक सुसीम की सर पर से होती हुई उसके बंधे केश खोलती चली गयी - सुसीम ने अपने केश पकड़ लिए और फिर अचानक राजकुमारी ने तलवार से एक और झटका दिया - सुसीम की धोती पर तलवार का वार हुआ और सुसीम को अपनी धोती खुलती नज़र आयी - वह सिटपिटा गया.
राजकुमारी तुरंत अपने घोड़े से उतरीं और एक गंभीर दृष्टि सुसीम पर डाली - तुम्हे कल की दी हुई सीख कदाचित स्मरण नहीं है. भविष्य में अगर तुमने हमारे किसी कार्य में हस्तक्षेप किया तो इसका परिणाम और भी भयंकर होगा. अपने सीमा से आगे मत निकलना अन्यथा जो हाल आज तुम्हारे केश का हुआ है वह तुम्हारी नासिका और अन्य भागों का भी हो सकता है. तुम्हे यहीं सबके सामने निर्वस्त्र कर दूँगी
सुसीम ने अपमानित दृष्टि से आस पास देखा और सबकी नज़रों में उपहास था - वह अपमान की पीड़ा से जल उठा.- निर्वस्त्र तो तुम्हे में करूँगा राजकुमारी अजंता - वह मन ही मन बोला,
राजकुमारी ने घोडा वापस घुडसवार को सौंपा और अपने रथ पर सवार हो गयीं
आज्ञानुसार वीरसिंह ने कुछ चुने हुए सैनिको को साथ लिया और राजकुमारी के साथ जंगल की ओर निकल पड़े. प्रत्यक्ष में राजकुमारी ने शिकार की बात की परन्तु उन्हें कुछ कुछ यह अंदेशा हो गया था की राजकुमारी वहां निश्चित रूप से आखेट नहीं अपितु कुछ और ही सोच कर जा रही थीं.
कल जिस प्रकार राजकुमारी ने माधोपुर में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था उस से वीर सिंह भी बहुत चकित और प्रभावित थे. एक छोटी सी लड़की इतनी वीर हो सकती है उन्होंने कभी सोचा नहीं था. यों तो उन्होंने ही राजकुमारी को तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया था परन्तु वह यह कल्पना भी नहीं कर सके थे की राजकुमारी थोड़े ही समय में इतनी निपुण हो जाएगी की वह जलाल सिंह जैसे योद्धाओं का न केवल सामना कर लेगी अपितु उसे परास्त भी कर देगी.
राजकुमारी का रथ सबसे आगे था और साथ में अंगरक्षक अपने रथ पर पीछे और कुछ आगे घोड़ों पर स्वर थे. लेकिन राजकुमारी का रथ शेरो द्वारा चलित था.
उनके सुन्दर चेहरे पर आज भी सूर्य के तरह चमकती आभा थी और एक प्राकृतिक मुस्कान भी.
सेनापति वीरसिंह राजकुमारी के साथ ही उनके रथ पर सवार थे.
जैसे ही स्वर्णपुर की सीमा पार हुई और जंगल समीप आने लगे , राजकुमारी का हृदय वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देख कर और भी प्रसन्न हो गया और वह इसका आनंद लेने लगीं. राजकुमारी को बचपन से ही जंगल में घूमना , रहना और अपना कुछ समय व्यतीत करना अति आनंदायक लगता था
राजकुमारी - वीरसिंह जी यह भी स्वर्णपुर का सौभाग्य है की यहाँ के जंगल हमारे ही राज्य का भाग हैं और इसकी समपदा से हमे बहुत लाभ होता है.
सेनापति हलके से मुस्कुराये - आप ठीक कह रही हैं राजकुमारी परन्तु _ _ _ _
राजकुमारी - परन्तु क्या _ _ _ _ _
सेनापति - इन जंगलों से जुडी कुछ समस्याएं भी हैं
राजकुमारी - जैसे _ _ _ किस प्रकार की समस्याएं ?
और तभी राजकुमारी ने पाया की कुछ कच्ची सड़कें आरम्भ हो गयी हैं और आगे के रास्तों का स्वर्णपुर की सड़कों की भाँति न तो भली प्रकार से निर्माण हुआ था और न वहां के घरों में सोने की सजावट इत्यादि थी. ऐसा प्रतीत होता था मIनो वहां पर आकर प्रगति जैसे रुक गयी हो और जंगल के पास के यह हिस्से किसी भी प्रकार से स्वर्णपुर राज्य का भाग नहीं लग रहे थे.
राजकुमारी - सेनापतीजी क्या यह हमारे राज्य में नहीं आते
सेनापति - नहीं राजकुमारीजी यह जंगल और पास के इलाके हमारे राज्य के ही हैं और स्वर्णपुर के अंतर्गत ही माने जाते हैं. और साथ ही उन्होंने सारथि को निर्देश दिया - आगे रथ थोड़ी धीमी गति से चलना.
यह सुनकर राजकुमारी अजंता ने प्रश्नसूचक दृष्टि से सेनापति वीरसिंह की ओर देखा
प्रश्न की प्रतीक्षा किये बिना सेनापति कह उठे - आगे कुछ और कच्चे रास्ती और एक सेतु है जिसका निर्माण कई वर्ष पूर्व हुआ था और जो बहुत अच्छी अवस्था में नहीं है
राजकुमारी - ऐसा क्यों सेनापति जी - इसका उतर दायित्व किसका है और इसका पुनर निर्माण क्यों नहीं किया गया. हमारे राज्य के सम्बंधित विभाग से इस विषय में __ __
और तभी राजकुमारी अजंता ने यह भी देखा की पगडण्डी शुरू होते ही उसके दोनों ओर स्वर्णपुर के सैनिक वहां पर पहरा दे रहे थे - राजकुमारी का रथ गुज़रते ही सबने उनकी जय जयकार करनी प्रारम्भ कर दी और अपने सर झुका दिए
राजकुमारी ने हाथ ऊपर उठा कर और कुछ मुस्कुराकर सबका अभिवादन किया परन्तु अंदर से वह बहुत चकित थीं.
उन्होंने सेनापति की ओर देख कर कहा - क्या कारण है की इस स्थान पर हमारे बहुत से सैनिक तैनात हैं
सेनापति - राजकुमारीजी वास्तव में यहाँ से जंगल का क्षेत्र प्रारम्भ हो गया है और यहाँ पर हमे कड़ी सुरक्षा रखनी पड़ती है
राजकुमारी - ऐसा क्यों - यह तो हमारा ही राज्य है फिर क्यों
ऐसा हो रहा है.
राजकुमारी की निगाहें दोनो ओर घूम रही थीं.एक जगह तो इतना मनोरम दृश्या था की राजकुमारी मंत्रमुग्ध हो गयीं – एक ऐसी गहरी शांत झील जिस पर अनंत आकाश की नीलभ छाया निरंतर तैर रही थी.यह अपार सौंदर्य का अप्रतिम रूप था. वास्तव में पहाड़ी के एक ओर से नदी अबोध रूप से बहती हुई एक चट्टान से टकराकर बाल खाकर मुड़ गयी थी और लंबी चौड़ी झील में संचित हो गयी थी. फिर उन्होने पगडंडी के आस पास की भारी भरकम चट्टाने , जंगल घास और घने पेधों की ओर ध्यान से देखते हुए सेनापति पर रुख़ किया और अपनी उंगलियों से माथे पर छा गये घने काले और पीछे से खुले बालों को ठीक करने लगीं.
सेनापति वीरसिंह – दरअसल यहाँ के आदिवासियों के साथ हमारी कुछ समस्याएं हैं.
राजकुमारी – कैसी समस्याएं?
सेनापति – इन आदिवासियों का कहना है के यह वॅन जिससे की स्वर्णपुर को अच्छी आय होती है और जो की स्वर्णपुर की सुरक्षा का कारण भी हो सकते हैं उनपर हमारा राज्य बिल्कुल ध्यान नही देता. यह आदिवासी कहते हैं की सैनिकों को उन पर पहरा करने के लिए तो तैनात कर दिया जाता है परंतु उनकी रक्षा करने के लिए स्वर्णपुर से उन्हे कोई सैन्य सहायता नही दी जाती और जब यह अपनी सुरक्षा स्वयं करते हैं तो इन्हे आतंक फैलने के लिए बदनाम किया जाता है. कई बार इन्हे अनेक बीमारियों का भी शिकार होना पड़ता है परंतु राज्य इन पर कोई ध्यान नही देता. और तो और रुद्रपुर के सैनिक भी कभी कभी यहाँ आक्रमण करके वन संपदा को नष्ट करते हैं परंतु इन आदिवासियों को स्वर्णपुर राज्य से कोई सरंक्षण या सहायता प्राप्त नही होती.
राजकुमारी पूरी बात बहुत ध्यान से सुन रही थी . उन्होंने सेनापति की बात बीच में कIटी और कहा - पर वीरसिंहजी इन तथ्यों पर कौन ध्यान देगा? क्या आपने कभी महाराज से इन सबके बारे में विचार विमर्श नहीं किया
सेनापति - राजकुमारीजी न केवल में अपितु महामंत्री भी महाराज से इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं. एक बार तो इन आदिवासियों के कहें पर हम इनके सरदार की महाराज से भेंट भी करवा चुके हैं. परन्तु महाराज इन सबसे कुछ प्रसन्न नहीं लगते और उन्होंने इन विषयों पर अधिक ध्यान नहीं दिया. वह इन आदिवासियों से प्रसन्न नहीं हैं और इनके सरदार को स्वर्णपुर में आने का अनुमति पत्र भी प्रदान नहीं किया. इसका परिणाम यह है की भले ही यह हमे जंगल में आने से रोक न पाएं परन्तु हमारे सम्बन्ध इनसे बहुत अच्छे नहीं हैं. महाराज का विचार है की रुद्रपुर के सैनिक और आदिवासी साथ साथ मिलें हैं जिसके कारण हमे अपनी सुरक्षा यहाँ बढ़ानी पड़ रही है।
राजकुमारी - यहाँ भी रुद्रपुर का वर्णन आ गया
सेनापति- हाँ क्योंकि रुद्रपुर की सीमा का एक भाग भी इन जंगलों से मिलता है. इतना ही नहीं राजकुमारीजी वहां पर एक डाकुओं का गिरोह भी सक्रीय है जो कई बार माधोपुर और इन जंगलों में लूट पाट मचा चुका है.
राजकुमारी - पर महाराज इस विषय में चर्चा करके भी आप लोग _ __ _
सेनापति - क्षमा करें राजकुमारी में इस विषय में अधिक नहीं कह पाउँगा. उनके सलाहकार महामंत्री के अलावा महा माया देवी और राज्य मंत्री शैतान सिंह भी हैं.अभी तक तो वित्त विभाग स्वयं महाराज देख रहे हैं. परन्तु राज्य मंत्री चाहते हैं की यह विभाग उनके नियंत्रण में हो.
राजकुमारी को कुछ कुछ समझ आने लगा की महाराज को गलत सलाह देने वालों का प्रभाव उन पर अधिक है , उनके स्वामिभक्तों की अपेक्षा. परन्तु उस समय उन्होंने खामोश रहना ही उपयुक्त समझा.
पर वह सोच में डूब गयी
तभी राजकुमारी का काफिला जंगल के और अंदर चला गया जहाँ उन्हें आदिवासिओं के छोटे छोटे कच्चे घर और कुटियाँ नज़र आने लगी. वहां के आदिवासी भी इधर उधर अपने कामों से घूम रहे था. सबने मुड़कर राजकुमारी का रथ देखा और उनमे से कुछ ने सर झुक कर अभिवादन भी किया परन्तु राजकुमारी ने भांप लिया की आदिवासी को उनके आने पर कोई प्रसन्नता नहीं हुई. इतने में एक विशाल पेड़ नज़र आया जिस की शाखाओं पर एक झौंपड़ी नुमा घर बना था. उसके नीचे एक लकड़ी की सीढ़ी थी जिस से आसानी से उसपर चढ़ा जा सकता था.
ठीक उसके नीचे कुछ आदिवासी भIला और तीर कमान लिए पहरा दे रहे थे. उन पहरेदारों के हाथों में भाले थे और शरीर के ऊपरी भाग नग्न थे. सिर्फ गुप्तांग के पास या तो घास फूस या चीते की खाल से बने के कुछ आवरण थे जो वस्त्रों का काम कर रहे थे. जैसे ही राजकुमारी का रथ आकर रुका , कुछ पहरे दार चौकन्ने ही गए. तब राजकुमारी का एक सन्देश वाहक रथ से उतरा और आगे चल कर उन पहरेदारों के पास गया - राजकुमारी अजंता पधारी हैं - आप अपने सरदार से कहें की वह उनसे भेंट करना चाहती हैं
एक पहरेदार ने दुसरे को इशारा किया तो वह ऊपर जाकर लौट आया - जिन्गाला महाराज अभी पूजा में वयस्त हैं. राजकुमारी की प्रतीक्षा करनी होगी
संदेशवाहक - तुम्हारा साहस कैसे हुआ इस तरह बात करने का . उनसे कहो की यह राजकुमारी का आदेश _ __ _ _ _
तभी राजकुमारी अजंता की आवाज़ ज़ोर से आयी - ठहरो संदेशवाहक - अगर सरदार पूजा में व्यस्त हैं तो कोई बात नहीं - हम प्रतीक्षा करेंगे.
वहां के कई आदिवासी राजकुमारी को देख कर हैरान थे - उन्होंने आज तक इतनी सुन्दर और इतनी प्यारी सी दिखने वाली लड़की शायद नहीं देखि थी - वह आपस में फुसफुसाने लगे - यह लड़की यहाँ क्यों आयी है
दुसरे ने कहा - यह कोई साधारण लड़की नहीं यहाँ की राजकुमारी है
पहले - बहुत सुन्दर है - और क्या राजशी वैभव भी - मैंने आज तक इतनी सुन्दर लड़की पहले नहीं देखी
तीसरा - देखोगे कैसे - राजमहल से यहाँ तो पहले कोई आया ही नहीं - वैसे इसका नाम क्या
दूसरा - पता नहीं - मुझे तो यहाँ के महाराज का भी नाम नहीं पता.
एक अन्य आदिवासी - यह राज महल के लोग पता नहीं स्वयं को क्या समझते हैं - कभी यहाँ पर आकर नहीं देखा की जंगल में हम कैसे रहते है और क्या क्या हालत है
काफी देर प्रतीक्षा के बाद एक रॉब दार विशालकIय दिखने वाला आदमी जिसके चेहरे पर बकरे जैसी दाढ़ी और सर पर आदमजात हड्डियों से बना मुकुट था और जिसके शरीर पर चीते की खाल से बने वस्त्र थे, नीचे उतरा.
वह उन आदिवासियों का सरदार था और सब उसके आते ही नत मस्तक हो गए. एक ने नारा लगाया - जिन्गाला महाराज की जय
जिन्गाला ने सबको हाथ हिलाकर सम्भोधित किया - आज हमारी ने नहीं स्वर्णपुर की राजकुमारी की जय जय कार करें. आज राजमहल वाले यहाँ पर रास्ता भूल गए हैं
राजकुमारी को आदिवासी सरदार के लहजे और व्यहवार में व्यंग्य साफ़ साफ़ दिख रहा था - परन्तु फिर भी उसने दोनों हाथ जोड़ कर कहा - जिन्गाला महाराज को राजकुमारी अजंता का प्रणाम.
प्रत्युत्तर में जिन्गाला महाराज ने भी वही किया और कहा - आईये राजकुमारी विराजमान हों.
राजकुमारी और जिन्गाला महाराजा आमने सामने बैठ गए और उन दोनों के अंग रक्षक उनके आस पास खड़े हो गए
तभी राजकुमारी ने पुरज़ोर स्वर में कहा - एकांत
राजकुमारी के अंगरक्षक चकित हो उनकी ओर देखने लगे - परन्तु राजकुमारीजी आप _ _ _ _
राजकुमारी - हमने कहा एकांत अर्थात एकांत
सब अंगरक्षक कुछ दूर जाकर खड़े हो गए
वह जिन्गाला के आदमियों की ओर देखने लगी . सरदार ने उन्हें भी इशारे से दूर जाने को कहा.
उनके जाते ही राजकुमारी ने सरदार जिन्गाला महाराज की ओर अपना रुख किया - सरदार हमे ज्ञात हुआ है की यह जंगल स्वर्णपुर की सीमा में ही आते हैं ओर _ _ _
जिन्गाला - बहुत जल्दी ज्ञात हो गया राजकुमारी. अपने आने का वास्तविक कारण हमे बताइये.
राजकुमारी - हमारे आने का यहाँ एक मुख्य उद्देश्य यह है की हम आपकी समस्याओं को जानना चाहते हैं . हमे ज्ञात हुआ है की जंगल जो की हमारी मुख्या सम्पदा हैं , उसमे डाकुओं की घुसपैठ, लूट पाट, चन्दन की लकड़ी का चोरी होना ओर जीव जंतुओं की शिकार के अलावा बिना कारण हत्या ओर उनकी खाल का गैरकानूनी तरीके से बाहर भेजा जाना , कई प्रकार के अवैध कार्य _ _ _
सरदार - हमारी समस्याओं का कोई अंत नहीं राजकुमारी परन्तु राजमहल को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं . राजमहल के प्रतिनधि यहाँ आकर कभी हमारी कठिनाईओं और हालत तथा बिमारियों पर कभी अपना ध्यान केंद्रित करते हैं - हाँ यदि कर समय पर न पहुंचे तो आपके सैनिक यहाँ आकर आपने आक्रोश दिखते हैं और हमसे कर वसूलते हैं. परन्तु में यह सब आपको क्यों बता रहा हूँ - आप राज महल से है और यहाँ की राजकुमारी - आपके पिता महाराज विक्रम प्रताप को हमसे घृणा है और हमे उनसे - आपके लिए उचित होगा की आप यहाँ से बिना एक पल भी व्यर्थ किये वापस राजमहल लौट जाएं अन्यथा _ _ _
राजकुमारी - अन्यथा _ __
सरदार - हमारी सहन शीलता की परीक्षा न लें राजकुमारी - आप अभी बिलकुल बच्ची हैं और कुछ भी नहीं समझतीं.
सरदार जिन्गाला महाराज बहुत देर तक राजकुमारी को जंगल के हालात से अवगत कराते रहे परन्तु उनके स्वर में रोष एवं कटुता थी - वह राजकुमारी से बहुत ही अधिक रुष्ट होकर बात कर रहे थे - और उन्होंने बिना किसी डर के महाराज और उनके कई अधिकारीयों और मंत्रियों की खुलकर बुराई की.
राजकुमारी चुप चाप धैर्य पूर्वक सारी बात सुनती रही. उन्होंने सरदार के बोलते समय एक शब्द भी न कहा.
अंत में सरदार ने कहा - हम एक ही इष्ट देवता को पूजते हैं राजकुमारी - मेरी आपसे यही विनती है की आप लौटते समय महाकाल को प्रणाम करें और फिर से यहाँ आकर अपना समय व्यर्थ न करें
राजकुमारी - हम आपका पहला कथन अवश्य मानेंगे सरदार. परन्तु रही बात यहाँ न लौट कर आने की तो - कुछ प्रतीक्षा करें - मैं राजकुमारी अजंता आपको वचन देती हूँ की एक दिन ऐसा आएगा जब आप सब लोग मुस्कुरा कर यहाँ मेरा अभिवादन करेंगे - आपको प्रणाम - जय महाकाल
और राजकुमारी ने आपने रथ पर बैठ कर वापसी का रुख लिया
सेनापति - मैंने आपसे पहले ही कहा था राजकुमारी - आप व्यर्थ ही यहाँ पर आयीं और अपना समय _ _ _
राजकुमारी ने बिना उनकी ओर देखे कहा - वीर सिंह जी आप हमे वचन देंगे
सेनापति - क्या
राजकुमारी - कल अगर स्वर्णपुर राज्य ओर प्रजा के हित एवं सुरक्षा को लेकर यदि में कोई कदम उठाना चाहूँ तो आप मेरा साथ देंगे?
सेनापति कुछ देर सोचते रहे - फिर एक मद्धिम स्वर में बोले - हाँ राजकुमारी.
राजकुमारी - बस वीरसिंह जी आप हमे दिए इस वचन पर कायम रहिएगा
वीरसिंह ने प्रश्नसूचक दृष्टि से राजकुमारी को देखा परन्तु वह उनकी बात का अर्थ न समझ पाए. वैसे भी राजकुमारी सामने की दिशा में देख रही थीं.

पर वीरसिंह ने गौर किया की राजकुमारी मंद मंद मुस्कुरा रही थीं ओर आदिवासियों के किये गए बर्ताव से भी वह अप्रसन्न और तनावग्रस्त नहीं लग रही थीं.
कुछ समय बाद राजकुमारी ने ही चुप्पी तोड़ी - वीरसिंह जी अब हम महाकाल के मंदिर जा रहे हैं
वीरसिंह ने सहमति में सर हिलाया - राजकुमारी कहती गयी - मुख्य मंत्री धर्मदेव सिंह जी भी आ रहे हैं
वीरसिंह ने सोचा शायद राजकुमारी उनसे पूछ रही हैं - नहीं ऐसा तो कोई कार्यक्रम नहीं बना था
राजकुमारीजी - आप चिंतित न हो, मैंने उन्हें आने के लिए कह दिया था.
वीरसिंह चकित होकर राजकुमारी की ओर देखने लगे.
राजकुमारी जैसे ही महाकाल के मंदिर पहुंची वहां पर कुछ सेवक ओर दासियाँ उनका अभिवादन करने आगे आ गए ओर कुछ दासियों ने उनके हाथ थामकर उन्हें रथ से उतारा
राजकुमारी ने मुख लहराकर दूसरी ओर किया तो उनके केश भी लहरा उठे ओर उनका आधा चेहरा ढक लिया - ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो एक छोटा सा गोल चाँद धरती पर उतर आया हो. गौरे गुलाबी मुखड़े को घने काले केशों ने समेटा था. मृग नयन से आँखें चंचलता से मुस्कुरा रही थीं.
रस भरे होंठ गुलाब की पंखुरियों से नाजुक थे. लाल ओर सुनहरे रंगो एवं सुनहरी कड़ाई से सुस्सजित राजकुमारी की चोली ओर लहंगा उनके सौंदर्य को तो बढ़ा ही रहे थे, साथ में उनकी चांदी की जूती में सोने के तारों का जाल लगा था ओर सोने के घुँघरू भी थे जो हर उठते कदम पर बज उठते थे. एक तराशी हुई मूरत की तरह असीम सौंदर्य को समेटे हुए राजकुमारी सबको आकर्षित कर रही थी. पूजा से पहले स्नान के तैयारी हुई. खुद वीरसिंह को यह ज्ञात नहीं था की राजकुमारी ने मुख्यमंत्री से कहकर एक विशाल पूजा का आयोजित किया था - इसी लिए पूजा से पहले स्नान की तैयारी भी थी.
एक सरोवर जो विशेष कर राजकुमारी के लिए ही बनाया गया था. सरोवर के पास जाकर एक कक्ष में कुछ परिचारिकाएं तो उनके वस्त्र ओर आभूषण उतरवाने में लग गयीं औऱ कुछ ने उनके कुंदन जैसे शरीर पर चन्दन औऱ दूध का उबटन मलना शुरू कर दिया.
जल में इत्र औऱ गुलाब जल छिरका गया. सरोवर में प्रवेश होने से पहले राजकुमारी अजंता ने अपने सब वस्त्र उतार दिए
राजकुमारी की कुंदन जैसी काया पर एक गुलाबी रंग की छोटी सी चोली और नीचे एक कच्छी थी।
नहाने से पूर्व राजकुमारी ने उन वस्त्रों को भी उतार दिया और सम्पूर्ण रूप से नग्न होकर जल में कूद गयी और अपने कुंदन जैसी सुन्दर काया को सरोवर के शीतल जल के हवाले कर दिया.ऐसा करते समय उनके गुलाब जैसे चेहरे पर एक बड़ी ही चंचल मुस्कान थी.

उभरते वक्षस्थल गदरायी कमर और अजंता की मूरत सा खिलता शरीर - राजकुमारी अपने सौंदर्य को देख कर कुछ स्वयं पर मोहित हो रही थीं.
स्नान के पश्चात उन्होंने सुनहरे और बेशकीमती नीले रंग के वस्त्र जिसमे सुनहरी कड़ाई की चोली और लहंगा था उसका चयन किया और कक्ष में जाकर तैयार होने लगी।

लहंगा पहनते समय उन्होंने एक दृष्टि अपने उभरते हुए वक्षस्थल पर डाली और वह लज्जा गयीं। फिर चोली और आभूषण धारण करने में दासियों ने सहायत की और उन्हें तैयार किया।

स्नान के बाद राजकुमारी एक विशाल कक्ष में पहुंची जहाँ महाकाल की एक असाधारण प्रतिमा विद्यमान थी औऱ आस पास छोटी बड़ी कई प्रकार की मूर्तियां थीं. संगीत के हलके सुर से पूजा कि प्रारम्भ हुआ. इस समय कक्ष में केवल राजकुमारी ही थी. राजकुमारी ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर जोड़े और कुछ देर एक ही पैर पर खड़े होकर महाकाल की आराधना की लगभग घंटे तक पूजा करने के बाद राजकुमारी ने उच्च स्वर में कहा - हे महाकाल मुझे अपना आशीर्वाद देकर मेरा आगमन मनगलमय करें.
ऐसे होने के कुछ देर पश्चात ही एक ज़ोरदार आवाज़ गूँज उठी - राजकुमारी अजंता - हम तुम्हारी भक्ति भावना से प्रसन्न हैं . बोलो क्या कहना चाहती हो.
अजंता - हे महाकाल मैं अपने आस पास भविष्य में कुछ संकट आने का चिन्ह देख रही हूँ, बहुत सारे कार्य जोकि स्वर्ण पुर के हित में होने चाहिए थे वह नहीं हो रहे.
महाकाल - राजकुमारी अजंता - तुम अपने भक्ति भाव और स्वर्णपुर को आगे लेजाने की लगन में पूर्ण रूप से अपनी तन्मयता से कार्य करो और मॉस में एक बार यहाँ आकर एक यज्ञ करो. महाकाल तुम्हे सफल होने का आशीर्वाद देते हैं. तुम्हारी राह कठिन हैं पर यदि तुम वीरता पूर्वक सभी चुनौतियों का सामना करोगी तो निश्चय ही सफलता पाओगी.
इसके पश्चात राजकुमारी राजमहल की ओर अपने रथ में प्रस्थान कर दी.
अभी जंगल का रास्ता पार भी नहीं हुआ था की सहसा राजकुमारी की दृष्टि एक पेड़ के पास एक मरे हुए जानवर पर पड़ी.
रथ रोको - राजकुमारी ने आदेश दिया.
वह रथ से उतरी ओर दो सैनिकों के साथ उसके समीप जाकर देखा. राजकुमारी अजंता ने पाया एक काले रंग की विभिन्न नस्ल की शेरनी मृत पड़ी थी. तभी उससे बिलकुल हलके से गुर्राने की आवाज़ आयी
सबने देखा की बगल में ही एक बहुत छोटा सा काला परन्तु बहुत प्यारा उस शेरनी का बच्चा उसके पैरों से लिपटा हुआ थाराजकुमारी को वह दृश्य बहुत ही करुणामयी लगा ओर उसने उस शेर के बच्चे को उठा लिया.
तभी राजकुमारी ने देखा की शेरनी के मृत शरीर के पास कुछ दूध बिखरा है और खून भी।
वह शेर का बच्चा कृन्दन कर रहा था और कदाचित भूख से वयाकुल था। राजमकुमारी ने एक दासी को आवाज़ लगायी और रथ में से एक सुनहरी पात्र से कुछ दूध लाने को कहा और सब सैनिको को कुछ पल रूकने का आदेश दिया। वह उस शेर के बच्चे को एक कोने में ले गयीं अपनी बांह में समेटकर।
बच्चा बही भी रो रह था और दूध को बड़ी कठिनाई से पी रहा था।
राजकुमारी ने इधर उधर देखा और एक छोटी सी नली पकड़ ली जिससे वह उस पात्र जो की एक छोटी सी से सुनहरी बोतल की भाँती था उसे उठा लिया। इस पूर्व राजकुमारी ने अपनी चोली उतार कर एक ओर रख दी और उस बोतल को अपने वक्षो में छुपा लिया ओर उस शेर के बच्चे को गोद में लिटाकर वह बोतल उस नाली से लगा दी। ढेर के बच्चे ने ऑंखें बंद करके चुप चाप दूध पीना आरम्भ कर दिया।

ऐसा प्रतीत हो रह था मIनो कोई कन्या अपना दूध ही शेर के बच्चे को पिला रही हो।
शेर का बच्चा कुछ शांत हुआ ।राजकुमारी ने चोली पहनी ओर झाड़ियों के झुरमुट से बाहर आ गयी।
चलो राजमहल - राजकुमारी ने आदेश दिया ओर पहुँचते ही उस शेर के बच्चे को एक सुरक्षित पिंजरे में रखवा दिया यह आदेश देकर की इसका पूरा ध्यान रखा जाये.
तभी एक परिचारिका ने आकर सूचना दी - राजकुमारी महाराज आ गए हैं ओर वह आपसे शीघ्र ही मिलना चाहते हैं - उन्होंने आपको अपने कक्ष में भेजने के लिया कहा है
राजकुमारी - ठीक है उनसे कहो में आ रही हूँ
महाराज के कक्ष में घुसते ही राजकुमारी ने मुस्कुराकर उनका अभिवादन किया - प्रणाम पिताजी. आशा करती हूँ की आपकी यात्रा सफल रही होगी
आशा के विपरीत महाराज का एक बहुत ही रूखा सा उत्तर आया - प्रणाम

फिर वह कुछ सख्त होकर बोले - सुना है आजकल तुम बहुत से निर्णय स्वयं ही लेने लगी हो.
राजकुमारी - में आपका तात्पर्य समझी नहीं पिताजी
महाराज विक्रम सिंह ने राजकुमारी की माधोपुर यात्रा और जंगल में आदिवासियों से भेंट का वर्णन किया - उनके स्वर में अप्रसन्नता साफ़ झलक रही थी.

राजकुमारी - पिताजी आपके इस राज्य का उत्तराधिकारी कौन है
महाराज ने ठन्डे ओर रूखे स्वर में उत्तर दिया - तुम - पर यह प्रशन्न क्यों ?
राजकुमारी - तो क्या यह मेरा कर्त्तव्य नहीं की में अपने राज्य ओर उसके आसा पास के हालत ओर समस्याओं को समझू और अपनी प्रजा को जानू.
महाराज - तो तुम अब हमे सिखाओगी की तुम्हे खुद को कैसे चलना है ओर _ _
राजकुमारी - मेरा अर्थ यह नहीं _ _
महाराज ने बीच में ही बात काट दी - इन आदिवासियों के पास जाने का कोई लाभ नहीं और माधोपुर के लोगों को क्या तुम जानती नहीं - भूल गयी की उस विदेशी का क्या हुआ था
राजकुमारी के मासूम चेहरे पर अचानक ही बहुत दर्द भरे भाव उत्पन्न हो गए ओर वह पलट कर चल दी - नहीं भूल सकती - कभी नहीं भूल सकती
ओर वह उदास होकर अपने कक्ष में प्रविष्ट हो गयी.

राजकुमारी एक दम ही बहुत थकी और उदास नज़र आने लगी - जॉन मेरे प्रिय बाल सखा - मेरे सबसे प्रिय मित्र - पता नहीं तुम कहाँ होंगे. तुम जीवित भी हो या नहीं

वह विचारों में खोयी थी और कुछ याद करके राजकुमारी की आँखों में आंसू आ गए ओर वह हिचकियाँ लेकर रोने लगी.

वह बहुत देर तक रोती रही ओर फिर उसके पश्चात बिना भोजन किया ही सो गयी

सुबह जब वह उठीं तो मन कुछ हलक था

वह तैयार होकर उस पिंजरे के पास पहुंची जहाँ वह शेर का बच्चा मौजूद था. पिंजरा खुलवाकर वह एक दासी के साथ अंदर प्रविष्ट हुईं ओर प्यार से उस बच्चे को उठा लिया
वह जोश भरे स्वर में बोली . यह शेर आज से मेरा सबसे प्रिय मित्र ओर साथी है जो हर कदम पर मेरा साथ देगा. और इसका नाम होगा - खूंखार
sujitha1976
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Re: maharani aur tarzan

Post by sujitha1976 »

टार्ज़न का जन्म
कुछ समय पूर्व

स्वर्णपुर के समुद्री तट पर बहुत अधिक हलचल थी. यहाँ अभी एक नौका समाचार मिलने के अनुसार डूब गयी थी परन्तु उसका कुछ पता नहीं लग पा रहा था. दो विदेशी लोगों की लाशें जो की उस नाव में से निकल कर समुद्री तट पर पड़ी हुई थीं, और जिनमे एक नर और एक नारी थे , कुछ सीमा तक क्षत विक्षत हो चुकी थीं. वह पुरुष विदेशी था और नारी हिंदुस्तानी ही थी. स्वर्णपुर के समुद्र पर तैनात सैनिक उस नौका को तलाश रहे थे. शवों के निकट सैनिकों के अतीरिक्त अन्य साधारण प्रजा भी थी जिसे नियंत्रण करने में सैनिकों को काफी कठिनाई पेश आ रही थी.
तभी घोड़े पर स्वर एक सैनिक टुकड़ी का प्रमुख वहां आ पहुंचा.उसे देखते ही सैनिको ने उसे प्रणाम किया - उस नौका का क्या हुआ - सैनिक- हम तलाश रहे हैं परन्तु उसका कहीं पता नहीं लग रहा.
प्रमुख - वह बहुत आवश्यक है. अन्यथा स्वर्णपुर के लिए हानि का विषय होगा और महाराज के क्रोध का सामना सबको करना होगा. मुझे समझ नहीं आ रहा की आप लोगों को उसे ढूंढ़ने में क्या कठिनाई है. वह कोई साधारण या छोटी मोटी नौका नहीं अपितु काफी बड़ी, सुस्सजित और कई भागों वाली नौका थी. उसमे बहुत ही अधिक बहुमूल्य सामान था और राज महल का राजसी खंजर _ _ वह कहता हुआ रूक गया.
सैनिक- जी आपने क्या कहा
सिपहसलार - कुछ नहीं सैनिको उसे ढूंढो. और यदि नौका का कोई भाग भी मिलता हो अथवा कोई अन्य वास्तु तो तत्काल सूचित करें.
स्वर्णपुर के सैनिक बिना विश्राम लगातार तलाश करते रहे और बीच बीच में सेना अधिकारी यहाँ तक की सेनापति वीरसिंह भी आकर पूछताछ कर गए. परन्तु कुछ भी न मिल सका.
दो दिन पश्चात
स्वर्णपुर के समुद्र से कहीं दूर जहाँ पर हिंदुस्तान की सीमा ने केवल समाप्त हुई अपितु बहुत पीछे छूट गयी थी एक नौका समुद्र में तैरती हुई जा रही थी. तेज़ हवाएं चल रहीं थी और किसी बहुत बड़े तूफ़ान का अंदेशा भी दे रही थीं. परन्तु वह नौका जो कीकाफी विशाल थी फिर भी चलती जा रही थी मIनो समुद्र ने उसका रास्ता तय कर दिया हो.
तभी उस नौका में से एक छोटा सा सिर उठान प्रारम्भ हुआ. एक गौर वर्ण का बड़ा ही सुन्दर लड़का जो की लगभग १५-१६ साल का होगा, जागता हुआ प्रतीत हुआ. साथ ही साथ उठने लगा. समुद्र में हवाएं और अधिक तेज़ चलने लगी और नौका भी कुछ हिलती प्रतीत हुई. वैसे इतने विशाल समुद्र में जिस प्रकार यह नौका चलती जा रही थी , यह एक चमत्कार ही था की वह नौका एक दम ठीक ठाक इतने समय इस तूफानी समुद्र में बहती जा रही थी, जिसमे कई जहाज डूब जाते हैं. नौका के रास्ते में कुछ जहाज भी आये जिन्होंने उस नौका को न केवल देखा अपितु उसे पकड़ना भी चाहा.परन्तु प्रकृति ने कदाचित उस नौका का पथ निर्धारित कर रखा था. वह लड़का कुछ होश में आता दिख रहा था. तभी स्वयं को एक बहती नौका में पाकर और आस पास समुद्र से घिरा देख कर वह कुछ घबरा सा गया- माँ , पिताजी - कहाँ हो. सहसा उसने देखा की उसकी नौका एक तट के समीप पहुँच गयी और वहां कुछ काले आदिवासी भले लेकर सागर तट पर ही नाच गा रहे थे. उनके साथ साथ पास ही के गांव के कुछ गोरे जिनमे गांव के मुखिया क्लार्क भी शामिल थे वहां के नाच गाने का आनंद ले रहे थे. सब लोग वहां पर मदिरा पान भी कर रहे थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था मIनो वहां कोई उत्सव चल रहा हो.
वह नौका तट के पास पड़े एक विशाल पत्थर जा टकराई और उस गौर वर्ण के लड़के के मुख से एक चीख निकली और वह पुनः मूर्छित हो गया.
उसकी चीख सुन कर उन काले आदिवासियों का ध्यान उस नौका की ओर गया और सब शोर करते तट पर पहुँच गए. उनमे से एक जो बेहद लम्बा चौरा था और सिर पर एक ऐसा मुकुट धारण किये था जो की आदमजात की हड्डियों से बना था, वहां अपने हाथ में एक भाल लेकर पहुंचा और देखने लगा.
एक आदिवासी बोला - सरदार देखिये इसमें तो एक बालक भी है.
सरदार - यह तो कोई गोरा है. कहीं ग्रीस या अन्य किसी गोरों के देश से तो नहीं आया.
दूसरा आदमी - कहीं यह किसी शत्रु की चाल तो नहीं. यह गोरा अवश्य किसी गोरों के देश से ही आया है.
सरदार - उस दिशा में हिंदुस्तान भी है.
एक आदमी- परन्तु यह कोई हिंदुस्तानी तो नहीं प्रतीत होता. वैसे भी एक ऐसी नौका का इतने दिन इस प्रकार से समुद्र में यहाँ तक आना -और हिंदुस्तान से असंभव.
सरदार उस लड़के को देखता रहा - इस बालक को मेरे खेमे में ले आओ.
दूसरा आदमी - पर सरदार अगर यह कोई शत्रु हुआ तो.
सरदार - जो मैं कह रहा हूँ करो और ओझा को भी मेरे पास भेजो. मुखिया जी - सरदार ने क्लार्क की ओर देखते हुए कहा - आप भी मेरे साथ आईये
क्लार्क - अवश्य - देखते हैं इस बालक को क्या हुआ है ओर यह है कौन.
ओझा उन आदिवासियों का वैद्य था जो कभी झाड़ फूंक और कभी दवा या जड़ीबूटियों से आदिवासियों का इलाज करता था. सरदार का आदेश पाते ही, वह उसकी झौंपड़ी जो की की एक मचान पर टिकी थी और काफी बड़ी भी थी. सरदार अपने सेवकों के साथ उसमे रहता था.
बड़ी जल्दी उसे गोरे से लड़के को वहां लिटा दिया गया.
ओझा - अरे यह तो बेहोश है.
सरदार - इसीलिए तो तुम्हे बुलाया है. चलो इस बालक को होश में लाओ. कुछ प्रयत्न के बाद उस बालक को होश आया और वह एक दम हतप्रभ स्थिति में उठ बैठा. उस बालक का सिर घूम रहा था. वह कुछ बोल नहीं रहा था. सरदार - बालक - तुम्हारा नाम क्या है.
उस लड़के का फिर सिर घूमने लगा मानो स्मरण करने का प्रयत्न कर रहा हो.
तभी ओझा ने कहा - सरदार इसके सिर के पीछे यह चोट का निशान है.
कुछ देर तक ओझा वहां पर उस बालक की देख रेख करता रहा - उसके पचत वह सरदार ओर मुखिया क्लार्क की ओर पलट कर बोला - मुझे ऐसा प्रतीत होता है की यह बालक आंशिक रूप से अपनी स्मरणशक्ति खो बैठा है.
दोनों चकित रह गए ओर एक दूसरे की ओर देखने लगे. सहसा क्लार्क की दृष्टि उस बालक के बाएं हाथ के निचले भाग पर गयी जहाँ उसे एक तिल दिखाई दिया. अधेड़ उम्र का क्लार्क चकित रह गया और उस बालक को और अधिक ध्यान पूर्वक देखने लगा. उसके मस्तिष्क को कुछ झटका लगा परन्तु न जाने क्यों उसने अपनी हैरत का प्रदर्शन सरदार और अन्य आदिवासियों के आगे नहीं किया. परन्तु क्लार्क के मस्तिष्क मैं कई प्रकार के प्रश्न जन्म ली लगे. तभी आदिवासी सरदार ने क्लार्क का ध्यान तोड़ा - मुखियाजी आप तो शिक्षित होने के साथ साथ ज्योतिष जानते हैं. और कुछ अन्य देशों में भी भ्रमण किये हैं. आप कुछ देख के बताईये इस बालक के बारे में. कैसा लग रहा है क्या आपके मन में चल रहा है. हम इस अनजान बालक का क्या करें.
क्लार्क - अवश्य. परन्तु उत्सुकतावश एक प्रश्न पूछना चाहूंगा.
सरदार - क्या?
क्लार्क - यदि इस समय मैं आपके समक्ष नहीं होता तो आप इस बालक को लेकर क्या निर्णय लेते?
सरदार - सोचते हुए - कदाचित यह हमारे साथ ही जंगल में पलटा बढ़ता. इतने प्यारे और सुन्दर बालक को हानि पहुँचाने का अपना मन तो नहीं होता. हाँ हम काले अफ्रीकियों में यह भिन्न अवश्य है.
क्लार्क - सरदार मैं आपके मुख से यही सुनना चाहता था. मैंने इस बालक के मस्तिष्क की रेखाएं और यहाँ तक हाथ भी देख लिया. यह किसी बहुत अच्छे और सुसंस्कृत परिवार से है जिसे की दुर्भाग्य ने यहाँ समुद्र तट पर ला फेंका है. और हाँ सबसे महत्वपूर्ण. इस बालक को आप ही नहीं हम सब अर्थात गांव वाले भी मिलकर पालेंगे. यह आगे चलकर बहुत बलशाली , वीर और जंगल प्रेमी होगा.
सरदार (मुस्कुराते हुए) - हाँ बड़ा होकर तो यह जंगल का राजा होगा.
क्लार्क - इतना ही नहीं हम गांव वाले इसे सभ्यता के गुण भी सिखाएंगे. आदिवासी सरदार इस बालक में राजा होने के योग हैं. पर जैसा आपने कहा हम सर्वप्रथम इसे जंगल का राजा बनाएंगे. यह हम लोगों में और जंगल के जानवरों में पल कर जंगल प्रेमी होगा और भविष्य में जहाँ भी जायेगा जंगलों की भलाई के लिए ही कार्य करेगा.
सरदार- मुखियाजी आप इतना कुछ बता रहे हैं. तो इस बालक को जो की अपनी समरणशक्ति कुछ सीमा तक खो बैठा है, कोई अच्छा सा नाम भी दीजिये.
क्लार्क - इसका नाम आजसे होगा - टार्ज़न.
उसके पश्चात मुखियाजी घर लौट गए.
मुखिया क्लार्क घर तो लौट आया परन्तु उसके मस्तिष्क में बहुत कुछ चल रहा था - हो न हो यह वही बालक है. तो फिर यह यहाँ कैसे इतने समुद्र पार करके पहुंचा ? आखिर ऐसे क्या हालत हो गए हैं. तो फिर मेरे मित्र और उसके परिवार का क्या हुआ.और हाँ उस डिब्बी में क्या है. (वास्तव में जब क्लार्क ने उस बालक का मुख देखा तो उसने आदिवासियों से यह भी पूछा था की उस नौका में और क्या क्या है. तो एक आदिवासी ने उसे एक छोटी सी डिब्बी लेकर दी जो लकड़ी की बनी थी जो क्लार्क ने बिना किसी को बताये अपनी जेब में रख ली)
जैसे ही क्लार्क को उस डिब्बी का विचार आया उसने वह डिब्बी अपनी जेब से निकली और उसे खोलकर देखा. और उस डिब्बी में जो था - उसे देख कर क्लार्क की आँखें हैरत से खुली रह गयीं.
दूसरी और वह बालक जिससे टार्ज़न का नाम दिया गया था अब उन आदिवसयोन में पलने लगा. जंगल के पेड़ और जानवर विशषकर शीता नाम का तेंदुए और अलफू हाथी तो उसके सबसे अच्छे मित्र बन गए थे. जंगल सा सादा परन्तु पौष्टिक भोजन , शुद्ध वायु और वहां का शीतल पानी उस बालक के स्वास्थ्य को भी चार चाँद लगाने लगा और धीरे धीरे उसकी मॉस पेशियाँ और अधिक मज़बूत एवं शक्ति शाली होने लगीं. क्लार्क तो मानो उसका 'चाचा' ही बन गया था. वह उसके साथ गांव और आस पास के इलाकों में घमूता और उसे शहरी सभ्यता का भी कुछ ज्ञान होने लगा. - वह बालक अब पूर्ण रूप से टार्ज़न ही बन रहा था.
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